सुंदरकांड · अध्याय 34

चूड़ामणि लेकर वापसी

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

हनुमान जी ने लंका जला दी है और सीता जी को सुरक्षित देखकर चैन की साँस ली है। अब लौटने का समय है।

हनुमान जी विदा लेने सीता जी के पास गए और बोले — माता, जैसे श्रीराम ने मुझे पहचान के लिए मुद्रिका दी थी, वैसे ही आप भी कोई निशानी दीजिए। सीता जी ने अपने बालों में लगी उतारकर दे दी।

साथ में उन्होंने एक ऐसी बात बताई जो केवल श्रीराम और वे जानते थे। वनवास में एक बार एक कौए ने उन्हें चोंच मारी थी। श्रीराम ने घास का एक तिनका उठाकर उस पर अस्त्र चलाया था। कौआ तीनों लोकों में भागा, पर कहीं शरण नहीं मिली। अंत में वह श्रीराम की शरण में आया। सीता जी ने कहा — यह बताना, ताकि प्रभु जानें कि संदेश सच्चा है।

हनुमान जी ने प्रणाम किया, पर्वत पर चढ़कर गर्जना की और समुद्र के ऊपर उड़ चले। उधर तट पर जामवंत, अंगद और बाकी वानर उनकी राह देख रहे थे। उनकी गर्जना सुनते ही सब समझ गए कि वे सफल होकर लौटे हैं। चारों ओर खुशी फैल गई।

रास्ते में वानरों ने सुग्रीव के प्रिय में घुसकर खूब फल खाए और मधु पिया। रखवाले दधिमुख ने सुग्रीव से शिकायत की। सुग्रीव हँस पड़े — अगर वानर इतने खुश हैं, तो सीता जी का पता ज़रूर मिल गया है!

वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम के सामने पहुँचते ही हनुमान जी ने सबसे पहले कहा — सीता जी को देख लिया। ताकि प्रभु एक पल भी चिंता में न रहें। फिर उन्होंने चूड़ामणि दी। उसे देखकर श्रीराम की आँखें भर आईं, और उन्होंने हनुमान जी को गले से लगा लिया।

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥ चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥

हनुमान जी बोले — माता, मुझे कोई निशानी दीजिए, जैसे श्रीरघुनाथ ने मुझे दी थी। तब सीता जी ने चूड़ामणि उतारकर दी, और पवनपुत्र ने उसे खुशी से ले लिया।

— श्रीरामचरितमानस, सुंदरकांड

आज के जीवन में सीख

अच्छी ख़बर देनी हो तो पहले वही बात कहिए जिसका सामने वाला इंतज़ार कर रहा है। हनुमान जी के दो शब्दों ने श्रीराम की सारी चिंता मिटा दी।

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सभी अध्याय

  1. 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
  2. 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
  3. 3विश्वामित्र और ताड़का वध
  4. 4अहल्या का उद्धार
  5. 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
  6. 6परशुराम का क्रोध
  7. 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
  8. 8कैकेयी के दो वरदान
  9. 9राम का वनवास
  10. 10केवट का प्रेम और गंगा पार
  11. 11राजा दशरथ का देहांत
  12. 12भरत का प्रेम और त्याग
  13. 13भरत मिलाप और राम की पादुका
  14. 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
  15. 15दंडक वन से पंचवटी तक
  16. 16शूर्पणखा
  17. 17खर-दूषण का वध
  18. 18मारीच और सोने का हिरण
  19. 19सीता हरण
  20. 20जटायु का बलिदान
  21. 21शबरी के बेर
  22. 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
  23. 23सुग्रीव से मित्रता
  24. 24बाली वध
  25. 25सीता की खोज और संपाती
  26. 26समुद्र लाँघने का निश्चय
  27. 27सुरसा और सिंहिका
  28. 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
  29. 29अशोक वाटिका में माता सीता
  30. 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
  31. 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
  32. 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
  33. 33लंका दहन
  34. 34चूड़ामणि लेकर वापसी
  35. 35विभीषण की शरणागति
  36. 36राम सेतु का निर्माण
  37. 37अंगद बने शांति-दूत
  38. 38युद्ध का आरंभ
  39. 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
  40. 40कुंभकर्ण
  41. 41मेघनाद वध
  42. 42रावण वध
  43. 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
  44. 44अयोध्या वापसी
  45. 45श्रीराम का राज्याभिषेक
  46. 46राम राज्य
  47. 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
  48. 48लव-कुश ने गाई रामायण
  49. 49सीता जी का धरती में समाना

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