किष्किंधाकांड · अध्याय 23

सुग्रीव से मित्रता

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

हनुमान जी श्रीराम को पहचानकर उन्हें और लक्ष्मण को अपने कंधों पर बिठाकर सुग्रीव के पास ले आए हैं।

हनुमान जी ने लकड़ियाँ जोड़कर आग जलाई। श्रीराम और सुग्रीव ने को साक्षी मानकर उसकी परिक्रमा की और एक-दूसरे के मित्र बन गए। वचन यह था — एक का सुख-दुख, दूसरे का सुख-दुख होगा।

सुग्रीव ने बताया कि कुछ दिन पहले एक राक्षस एक रोती हुई स्त्री को आकाश मार्ग से ले जा रहा था। उसने कुछ गहने कपड़े में बाँधकर नीचे गिराए थे। गहने देखते ही श्रीराम की आँखें भर आईं। लक्ष्मण ने कहा — मैं बाजूबंद और कुंडल नहीं पहचानता, पर ये पायल ज़रूर भाभी की हैं, क्योंकि मैं रोज़ उनके चरणों को प्रणाम करता था।

फिर सुग्रीव ने अपनी कहानी सुनाई। एक बार मायावी नाम का राक्षस बाली से लड़ते हुए एक गुफा में घुस गया। बाली उसके पीछे गया। बहुत दिनों बाद गुफा से खून बहता देख सुग्रीव ने समझा कि भाई मारा गया, और गुफा का मुँह पत्थर से बंद कर दिया।

पर बाली जीवित लौटा। उसे लगा कि सुग्रीव ने राज्य पाने के लिए धोखा दिया है। उसने सुग्रीव को मारकर भगा दिया और उसकी पत्नी रूमा को भी छीन लिया। तब से सुग्रीव ऋष्यमूक पर छिपकर रहता था, जहाँ मतंग ऋषि के शाप के कारण बाली नहीं आ सकता था।

सुग्रीव को श्रीराम की शक्ति पर पूरा भरोसा नहीं था, क्योंकि बाली बहुत बलवान था। तब श्रीराम ने एक ही बाण से के सात विशाल पेड़ों को एक साथ भेद दिया। यह देखकर सुग्रीव का डर मिट गया और उसने श्रीराम के चरण पकड़ लिए।

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥

जो लोग मित्र के दुख से दुखी नहीं होते, उन्हें देखने भर से भी बड़ा पाप लगता है।

— श्रीरामचरितमानस, किष्किंधाकांड

आज के जीवन में सीख

सच्ची दोस्ती बराबरी की होती है — तुम मेरी मुश्किल में साथ दो, मैं तुम्हारी में। और भरोसा कभी-कभी दिखाकर जीतना पड़ता है।

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सभी अध्याय

  1. 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
  2. 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
  3. 3विश्वामित्र और ताड़का वध
  4. 4अहल्या का उद्धार
  5. 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
  6. 6परशुराम का क्रोध
  7. 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
  8. 8कैकेयी के दो वरदान
  9. 9राम का वनवास
  10. 10केवट का प्रेम और गंगा पार
  11. 11राजा दशरथ का देहांत
  12. 12भरत का प्रेम और त्याग
  13. 13भरत मिलाप और राम की पादुका
  14. 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
  15. 15दंडक वन से पंचवटी तक
  16. 16शूर्पणखा
  17. 17खर-दूषण का वध
  18. 18मारीच और सोने का हिरण
  19. 19सीता हरण
  20. 20जटायु का बलिदान
  21. 21शबरी के बेर
  22. 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
  23. 23सुग्रीव से मित्रता
  24. 24बाली वध
  25. 25सीता की खोज और संपाती
  26. 26समुद्र लाँघने का निश्चय
  27. 27सुरसा और सिंहिका
  28. 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
  29. 29अशोक वाटिका में माता सीता
  30. 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
  31. 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
  32. 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
  33. 33लंका दहन
  34. 34चूड़ामणि लेकर वापसी
  35. 35विभीषण की शरणागति
  36. 36राम सेतु का निर्माण
  37. 37अंगद बने शांति-दूत
  38. 38युद्ध का आरंभ
  39. 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
  40. 40कुंभकर्ण
  41. 41मेघनाद वध
  42. 42रावण वध
  43. 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
  44. 44अयोध्या वापसी
  45. 45श्रीराम का राज्याभिषेक
  46. 46राम राज्य
  47. 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
  48. 48लव-कुश ने गाई रामायण
  49. 49सीता जी का धरती में समाना

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